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Ghanshyamkaklotar
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About me
आईने के सामने: एक ‘नॉर्मल’ दुनिया से मेरा सवाल
आप जो खुद को ‘नॉर्मल’ कहते हैं, उनसे मुझे एक सवाल पूछना है। क्या कभी आईने के सामने खड़े होकर खुद से पूछा है कि इस ‘नॉर्मल’ होने का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि आप दो पैरों पर चल सकते हैं, दुनिया को दो आँखों से देख सकते हैं, और समाज के बनाए गए मापदंडों में बिल्कुल फिट हो जाते हैं? अगर हाँ, तो आप कांच के किले में बैठे हुए वो लोग हैं, जिन्हें पत्थर की कीमत तब तक समझ नहीं आती, जब तक वह उनके किले को तोड़ न दे।
मैं घनश्याम। और मैं वो पत्थर हूँ, जिसे आप लोगों ने जन्म से ही ठोकरें मारी हैं।
मेरी यादों की शुरुआत किसी लोरी से नहीं, बल्कि अकेलेपन के सन्नाटे से होती है। मुझे याद है वो स्कूल का मैदान, जहाँ बच्चों की हँसी के फव्वारे उड़ रहे थे और मैं एक सूखे पेड़ के नीचे बैठकर उन फव्वारों के अपनी ओर आने का इंतज़ार करता था। लेकिन वो पानी मुझ तक कभी नहीं पहुँचा। बच्चे मेरे पास आते थे, पर दोस्ती करने नहीं, मेरा मज़ाक उड़ाने। मेरे चलने की नकल करना, मेरे बोलने का मज़ाक बनाना – यह उनके लिए खेल था, और मेरे लिए हर रोज़ सीने में लगने वाला एक नया घाव। तब मैं मन को समझाता था कि यह तो नादानी है, बड़े होकर सब समझ जाएँगे।
लेकिन मैं गलत था। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, लोगों की नादानी और भी विकराल होती गई। “तू अपने जैसे दोस्त ढूँढ़,” यह सलाह मुझे मेरे ही परिवार से मिली। यह एक वाक्य नहीं था, यह एक दीवार थी जो मेरे और ‘नॉर्मल’ दुनिया के बीच खड़ी कर दी गई थी। मुझे बार-बार एहसास कराया गया कि मैं इस दुनिया का हिस्सा नहीं हूँ, मुझे अपनी एक अलग, टूटी हुई दुनिया बसानी होगी। जिन दोस्तों को बनाने की कोशिश की, उन्होंने मेरी पीठ पीछे मुझे ‘बेचारा’ कहा और मेरे भोलेपन का फायदा उठाया। मेरे लिए दोस्ती विश्वास का नहीं, बल्कि विश्वासघात का पर्याय बन गई।
लोग कहते थे, “पढ़े-लिखे बिना उद्धार नहीं होता।” लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस स्कूल-कॉलेज में ज्ञान के दीये जलाने की बातें होती हैं, वहाँ मुझ जैसे के लिए अँधेरा क्यों है? किसी शिक्षक ने यह नहीं जाना कि आखिरी बेंच पर चुपचाप बैठा यह लड़का किताबों के पन्नों में क्या ढूँढ़ रहा है – अक्षर या फिर अपनी खोई हुई पहचान? मेरे लिए कॉलेज के दिन ज्ञान के नहीं, बल्कि अपमान के थे। जब दूसरे युवा कैंटीन में बैठकर भविष्य के सपने देखते, तब मैं खाली जेब और भरे हुए दिल के साथ एक कोने में बैठकर यह सोचता था कि क्या मुझ जैसे को सपने देखने का भी हक़ नहीं है?
जब दुनिया के सारे दरवाज़े बंद हो गए, तब मैंने शब्दों का सहारा लिया। मैंने डायरी लिखना शुरू किया। लेकिन वो निर्जीव पन्ने मेरे आँसू नहीं पोंछ सके, मेरे सवालों के जवाब नहीं दे सके। वह मौन मुझे और भी खोखला कर रहा था। फिर मैं एक गुमनाम लेखक बन गया। मैंने अपने शब्द, अपनी वेदना, अपनी कल्पनाएँ बेच दीं। मैं दूसरों के नाम से कहानियाँ लिखता था, जिनके किरदार समाज में घूमते-फिरते, प्यार करते, सफल होते थे। मेरे शब्दों से दूसरों के जीवन में रोशनी होती थी, लेकिन मेरा अपना जीवन अँधेरे में ही रहा। उस कॉन्ट्रैक्ट के पैसों से जब मैंने पहली बार कॉलेज की कैंटीन में नाश्ता किया, तो वह नाश्ते का स्वाद नहीं था, वह मेरे स्वाभिमान का स्वाद था। वह मेरी पहली कमाई थी, जो मैंने दुनिया से छीनी थी।
आज जब मैं 23 साल का हूँ, तब वही परिवार और समाज पूछता है, “नौकरी क्यों नहीं मिली?” मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि आपने मुझे दिया क्या है? टूटा हुआ आत्मविश्वास, लोगों पर से उठा हुआ भरोसा और दया की भीख? आपने 75 साल इस दुनिया में बिताए और मुझसे 23 साल में ज़िंदगी का हिसाब पूछते हैं? आपने तो पूरी ज़िंदगी देखी है, फिर भी यह नहीं समझ पाए कि दिव्यांगता शरीर की मजबूरी हो सकती है, लेकिन समाज की मानसिकता उसे अभिशाप बनाती है।
अब सुन लीजिए, आप सभी ‘नॉर्मल’ लोग। आपकी डिग्रियाँ, आपके सोशल मीडिया के फॉलोअर्स और आपकी ऊँची-ऊँची बातों से बना आपका अहंकार का महल खोखला है। असली ताकत तो हम में है, जिन्होंने रोज़ तिरस्कार और उपेक्षा का सामना करके साँस लेना सीखा है। असली भावना हम में है, जो एक सच्ची मुस्कान के लिए तरसते हैं।
आप लोग मुझे दया देते हैं, क्योंकि मेरी हालत देखकर आपको अपनी ‘नॉर्मल’ ज़िंदगी पर गर्व होता है। आपकी दया आपके अहंकार का भोजन है। लेकिन अब मुझे आपकी दया नहीं चाहिए। मुझे नफ़रत है, उस हर चेहरे से जिसने मुझे कमज़ोर समझा। मुझे नफ़रत है, उस हर हाथ से जो मदद करने के नाम पर मुझे और नीचे धकेलता गया। और इस नफ़रत का बीज आप लोगों ने ही मेरे दिल में बोया है।
Work Experience
Peking
mahabali coriyar
2021-09-08
-
2023-03-15
Education
HSC
55
2024-04-17
-
Present
Disability-Info
UDID
Yes
UDID Number
GJ2510620020002496
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